मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया। ख्यात शायर और गीतकार मजरुह सुल्तानपुरी जी का ये शेर यहां पूरी तरह से मौजू है क्यों…
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