ये पिंजरा हमारी भौतिक इच्छाओं की पराकाष्ठा है। हम पक्षी को नकली मानकर उसे भी पिंजरे में ही देखना पसंद करते हैं। जिस तरह से असल पक्षी होता है। हमें पक्षी को आखिर कैद क्यों करना है, क्यों हमने इस मानसिकता को इतना जड़ बना लिया है कि बाजार भी समझ गया कि हम पक्षी को कैद में रखने की इच्छाओं पर काबू नहीं कर पाएंगे, हालांकि एक और तर्क ये भी हो सकता है कि असली पिंजरे सेतो यही सही है लेकिन मेरी आपत्ति है कि कैद करने की प्रवृत्ति ही खत्म क्यों न हो। गणतंत्र दिवस पर इस पिंजरा मानसिकता को खत्म करें और पक्षियों को हमेशा के लिए आजाद करें। सोचिएगा। ये जो बाजार है ये हमसे अधिक हमें जानने लगा है, ये मानवीय नहीं है, ये कारोबारी है। मैंने जब इस पिंजरे को बाजार में देखा तो हक्का बक्का रह गया, ये नकली चिड़िया बोलती भी है। मैं सोचता हूँ हम अपनी आजादी का जश्न हर बार मनाते हैं लेकिन हमारे इसी समाज में पक्षी बंधक बनाए जाते हैं। आजादी पर खिलखिलाते हम एक बार ये भी सोच लें कि पिंजरे में पक्षी हमारे बारे में क्या धारणा बनाता होगा, प्लीज़ छोड़ दीजिए आज सारे कैद पक्षियों को। आजाद कर दीजिए, देखिए ये आजादी आपको कितनी राहत देगी। फोटोग्राफ गूगल से साभार