झरोखे सच कहते हैं... मन में दबा हुआ सच उन्हें महल का दरबान बना देता है... । मन से जिस्म तक घूरती आंखें अक्सर झरोखे की तहजीब पर उंगली उठाती हैं... लेकिन झरोखा विचलित नहीं होता... वो शर्म ओढ़े खड़ा रहता है...। अक्सर हमने पुराने किलों में झरोखे देखें होंगे वे अब तक अपनी आचार संहिता में तैनात हैं। इतिहास गवाह है कि झरोखों से साजिशों ने भी झाका होगा और नेह के रंग भी तराशे गए होंगे कुछ कोरी आंखों से। कुछ रंग चेहरों के, कुछ विवशता की टूटन, कुछ हार का भय, बहुत सी जीत का उल्लास। झरोखों से पूछा जाता कि क्या कुछ कहना चाहते हैं इतिहास में अपनी मौजूदगी पर। मुझे यकीन है वे बहुत कुछ ऐसा कहते कि शब्द सूखी किताब के पन्नों में गहरे गढ़ जाते, मैं देखता हूं उन्हें अब भी, वे किसी आंख के करीब आते ही अपने आंसु अक्सर पोंछ लिया करते हैं, झरोखों को देखियेगा अबकी जाएंगे जब भी किसी पुराने से किले की टूटी से दीवारों की जब्त सी खिड़की में।